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बगैर साहुकारी लाईसेंस के मनमाने ढंग से वसूला जा रहा ब्याज
कोरोना काल में सुदखोरों के आतंक का शिकार हो रहे जरूरतमंद लोग
शाजापुर (मंगल नाहर)
। सख्त कानून और कठोर नियम होने के बावजूद इन दिनों शहर सहित सम्पूर्ण जिले में सूदखोरों का आतंक दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है जिनके जाल में फंसे सैंकड़ों परिवारों को किसी प्रकार की राहत नहीं मिल पा रही है। जरूरतमंद लोगों की मजबूरी का बखूबी फायदा उठाकर उन्हें अपनी गिरफ्त में लेने वाले तथाकथित ब्याजखोर बकायदा बाजारों में दुकानें खोलकर व्यापार की आड़ में बिना लायसेंस के ब्याजखोरी का गोरखधंधा कर रहे हैं और इन लोगों पर नकेल कसने के लिए प्रशासनिक कार्रवाई शुन्य नजर आ रही है। गौरतलब है कि कोरोना महामारी के कारण कई परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है और लोगों के सामने जीवन यापन का संकट खड़ा हो चुका है। बीमारी के चलते बड़ी बेरोजगारी और किसी तरह की शासकीय मदद नहीं मिलने से आर्थिक मंदी के हालात बनना शुरू हो चुके हैं। एसे नाजुक दौर में जिलामुख्यालय सहित आसपास के क्षैत्रों में एक कारोबार तेजी से फलता-फुलता नजर आ रहा है जिस पर न तो प्रशासनिक अंकुश है और न ही किसी तरह की रोक-टोक। कम समय में अधिक धन कमाने वाली इस स्कीम का नाम है अवैध ब्याजखोरी। जिसमें आर्थिक तंगी के शिकार जरूरतमंद लागों को थोड़ा पैसा ऊधार देकर पहले अपने शिकंजे में लिया जाता है और फिर शुरू होता है उनसे मनमाने तरीके से ब्याज की मोटी रकम वसूलने के लिए संबंधित को प्रताड़ित करने का सिलसिला। बिना वैध लायसेंस के कानूनी नियम – कायदों की धज्जियां उड़ाने वाले इन ब्याजखोर गिद्धों ने बकायदा 10 से 40 प्रतिशत तक ब्याज वसूली करते हुए ब्याजखोरी के शिकार पीड़ित परिवारों के सामने जीवन यापन का संकट खड़ा कर दिया है। हालात यह बन चुके हैं कि सुदखोरों की यातनाओं से तंग आकर कई लोग अपने गृहस्थ जीवन को तबाह करने की स्थिति में पहुंच गए हैं। एसे अपराधियों पर किसी तरह की सख्ती नहीं होना जहां आम लोगों के जीवन के लिए भारी खतरा बनता जा रहा है वहीं प्रशासन के लिए भी नियम – कायदों को चुनौती देने वालों पर अंकुश लगाना आवश्यक होता दिखाई दे रहा है।
लगातार बढ़ रही पीड़ितों की संख्या
शहर में निर्धन, आर्थिक रूप से कमजोर तथा जरूरतमंद लोगों के साथ ही शासकीय उपक्रमों में काम करने वाले कर्मचारी, छोटे व मध्यम व्यापारी, निजी क्षेत्र में नौकरीपेशा सहित अन्य कई लोग ब्याजखोरों के चंगुल में पहले से ही आकंठ फंसे हुए हैं। जो अपने मूलधन से कई गुना अधिक भूगतान करने के बावजूद कर्जदार बनकर प्रताड़ना झेल रहे हैं। कोरोना महामारी में इंसानी शोषण करने वाले इन ब्याजखोर गिद्धों की चांदी हो रही है। जरूरतमंद लोग अपनी आर्थिक मजबूरी में इनका शिकार हो रहे हैं। इन पर किसी तरह की ठोस कार्रवाई नहीं होने के चलते पूर्व में कई लोग आत्महत्या करने और जहर खाने जैसे आत्मघाती कदम भी उठा चुके हैं।
लायसेंस लेना जरूरी.. 
नियमानुसार ब्याज पर पैसा चलाने के लिए स्थानीय निकाय व प्रशासन से लायसेंस लेना जरूरी है। इसमें भी ब्याज, बैंक ब्याज की दर से अधिक नहीं वसूला जा सकता। इसके विपरीत शहर में लायसेंस लिए बगैर ही यह गोरखधंधा दमदारी के साथ चल रहा है और कहीं इक्का-दुक्का लोगों ने लायसेंस लिए भी हैं तो वे कर्जदारों से अवैधतौर पर मोटा ब्याज वसूल कर रहे हैं।
ग्रामीण अंचलों में हालात असामान्य
सुदखोरों की मनमर्जी का असली आलम यदि देखना है तो वह आपकों ग्रामीण अंचलों में आसानी से नजर आ सकता है। जहां भोले – भाले ग्रामीणों को उनकी जरूरत के समय मीठी – मीठी बातें करके अपने जाल में फंसाने वाले ब्याजखोर थोड़ा पैसा ऊधार देकर बाद में उनसे 10 से लेकर 40 प्रतिशत की दर तक ब्याज वसूलते हैं। इस पर ब्याज नहीं चुका पाने अथवा भूगतान में देरी होने की दशा में पीड़ित पक्ष को कई प्रकार से परेशान किया जाता है। चूंकि सूदख़ोर कई बार बाजार में रसूखदारों और राजनेताओं के साथ बैठे हुए दिखाई देते हैं। ऐसे में पीड़ित व्यक्ति इनकी शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता और मूल रकम से कई गुना अधिक रकम का भूगतान करने के बाद भी कर्ज में डूबकर परेशान रहता है।
पहले रख लेते हैं पासबुक – एटीएम और चेक
ब्याजखोर राशि देने के साथ ही पीड़ित से कई ब्लैंक चेक, एटीएम कार्ड व बैंक की पासबुक तक रख लेते हैं। शासकीय सेवक होने पर वेतन खाते में जमा होते ही एटीएम या चेक लगाकर राशि सीधे सूदखोर निकाल लेते हैं। इसके चलते वेतन वाले दिन बैंकों के आसपास ब्याजखोरों की जमात दिनभर खड़ी दिखाई देती है। सूदखोरों का ब्याज 10 से 30-40 प्रतिशत तक होता है वहीं प्रतिदिन की किस्त तय करने के बाद नहीं देने पर पैनल्टी के नाम पर अलग से राशी वसूली जाती है।
जमा राशि का नहीं होता कोई सबूत
ब्याजखोर सीधे एटीएम से राशि निकाल लेते हैं जिसके चलते पीड़ित व्यक्ति के पास ब्याज के रूप मे जमा की गई राशि को लेकर कोई सबूत नहीं रहता। शिकायत करने पर ब्याजखोर मामले से पल्ला झाड़ लेते हैं और ब्लैंक चेक में मनमानी रकम भरकर किसी अन्य करीबी के नाम से बैंक में लगाकर बाउंस कराने के बाद कोर्ट में केस लगा देते हैं। इससे पीड़ित दोहरी परेशानी में पड़ जाता है।

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