Domain Registration ID: DF4C6B96B5C7D4F1AAEC93943AAFBAA6D-IN Editor - Rahul Singh Bais, Add: 10, Sudama Nagar Agar Road Ujjain M.P. India, Mob: +91- 81039-88890

देश में पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतों से जनता पस्त है। 2014-15 में पेट्रोल जहां 66 रुपये प्रति लीटर और डीजल 50 रुपये प्रति लीटर मिल रहा था, आज दिल्ली में आज पेट्रोल का दाम 101.19 रुपये जबकि डीजल का दाम 89.72 रुपये प्रति लीटर है। कई शहरों में पेट्रोल 100 रूपये प्रति लीटर तक पहुंचा हुआ है।  

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आमतौर पर माना जाता है कि पेट्रोल-डीजल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत से तय होती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें घट जाने के बाद भी घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल महंगा ही मिलता है। आइए, समझते हैं कि क्या है पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ने का फॉर्मूला?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव कम, फिर भी महंगा ही मिलता है पेट्रोल-डीजल
तेल कंपनियां यह देखती हैं कि पिछले 15 दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में भावों का औसत क्या है, उसी हिसाब से दाम तय किए जाते हैं। यानी जब कच्चे तेल के दाम घटते या बढ़ते हैं तो उसका असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है। लेकिन जनवरी 2020 से लेकर जनवरी 2021 के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव में 13 फीसदी की कमी आने के बावजूद घरेलू बाजार में लोगों ने 13 फीसदी ज्यादा की कीमत चुकाई। 

जनवरी 2001 में कच्चे तेल का भाव 29 रुपये था जबकि लोगों को यह 78 रुपये में मिल रहा था। इसके बाद कोरोना महामारी फैल गई। फरवरी में कच्चे तेल की कीमत 25 रुपये हो गई लेकिन घरेलू बाजार में यह लोगों को महंगे दामों पर ही मिल रहा था। मार्च 2020 में जब दुनियाभर में लॉकडाउन लगने लगा तो कच्चे तेल की कीमत 29 रुपये से घटकर 16 रुपये हो गई लेकिन फिर भी घरेलू बाजार में लोगों ने महज 5 रुपये कम चुकाए।

कई तरह के टैक्स से बढ़ जाती है कीमत
दरअसल इन उत्पादों पर लगने वाले टैक्स घरेलू बाजार में कीमतें बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पेट्रोल की कीमत बढ़ने का एक प्रमुख कारण स्थानीय करों की ज्यादा वसूली है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भले ही पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम हो, लेकिन उसका असर घरेलू बाजार में इसलिए नहीं होता है क्योंकि आम उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते सरकार कई तरह के टैक्स लगा देती है। पहले इस पर उत्पाद शुल्क और उपकर लगाती है, जिससे सरकार को राजस्व मिलता है।

राज्य सरकार वसूलती है वैट
इसके अलावा राज्य सरकारें बिक्री कर या वैट वसूलती है। उसके बाद मालभाड़ा, डीलर कमीशन, वैल्यू एडेड टैक्स जुड़ जाता है। कुल कर मिलाकर पेट्रोल के खुदरा बिक्री मूल्य का 58 प्रतिशत है और वर्तमान में डीजल के खुदरा बिक्री मूल्य का लगभग 52 प्रतिशत। इसका मतलब हुआ कि अगर पेट्रोल की कीमत 100 रुपये प्रति लीटर है, तो मोदी सरकार और राज्य सरकारों की ओर से लगाए गए करों में 58 रुपये का हिसाब है। इसमें से केंद्र सरकार का उत्पाद शुल्क लगभग 32-33 रुपये है और बाकी वैट है जो राज्य सरकारें लगाती हैं। इस तरह आम उपभोक्ताओं तक पहुंचते-पहुंचते पेट्रोल-डीजल महंगा मिलता है और उपभोक्ताओं को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत का फायदा नहीं मिल पाता है। 

तेल कंपनियां रोज तय करती हैं कीमतें
भारत मुख्य रूप से आयात के माध्यम से अपनी घरेलू तेल की मांग को पूरा करता है। अपनी जरुरत का 80 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल बाहर से मंगवाता है। कच्चे तेल की कीमत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) ही तय करता है। भारत को भी उसी कीमत पर कच्चा तेल खरीदना पड़ता है जो ओपेक तय करता है। सरकारी तेल कंपनिया पेट्रोल-डीजल की कीमत रोज तय करती है।