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मां महालया और महामाया नगर को प्रकोप से बचाती है

24 खंबे बने होने से यह स्थान 24 खंबा माता के नाम पर मशहूर हुआ
उज्जैन।
नगर के महाकालेश्वर मंदिर के समीप हजारों वर्ष पूर्व बने चौबीस खंबा माता मंदिर में स्थित महामाया और माहालाया देवियां उज्जयिनी सम्राट राजा विक्रमादित्य की अष्ट देवियों में गिनी जाती थी। जब-जब भी उज्जयिनी पर किसी भी तरह का प्राकृतिक प्रकोप आया या फिर बाहरी राजाओं द्वारा उज्जयिनी पर आक्रमण किया हो तब-तब राजा विक्रमादित्य ने देवी प्रकोप और आपदाओं से पार पाने और बाहरी सेना को परास्त करने के लिए माताजी के दरबार में आकर पूजा-अर्चन कर उन्हें प्रसन्न किया और उज्जयिनी को खुशहाल किया और विदेशी अताताईयों से अपने पराक्रम के बल पर महालाया और महामाया के आशीर्वाद से विजयश्री पाई। राजाभोज ने अपने शासन काल के दौरान भगवान श्री महाकालेश्वर मंदिर के साथ-साथ चौबीस खंबा मंदिर में विराजित महालाया और महामाया मंदिर का पुनर्निमाण करवाया था। मंदिर को कई बार मुस्लिम शासकों ने भी नुकसान पहुंचाया लेकिन हर बार उस समय शासन करने वाले शासकों ने मंदिर को पुन: उसी रूप में लाने के प्रयास किए। कहा जाता है कि भगवान महाकालेश्वर मंदिर में जाने के लिए महाकाल वन में 4 दरवाजे बने थे और इनके आसपास परकोटे भी बनाए गए थे। उन्हीं में से 24 द्वार के इस दरवाजे से भगवान महाकालेश्वर मंदिर में प्रवेश किया जाता था और पूरी उज्जयिनी की रक्षा महामाया और महालाया करती थी।

24 खंबे बने होने के कारण यह स्थान देश-विदेश में 24 खंबा माता के नाम पर मशहूर हुआ। काले और बादामी पत्थरों से निर्मित यह मंदिर राजा विक्रमादित्य के समय से बना हुआ बताया जाता है। वर्तमान में यह स्थान पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है। यह मंदिर अभी काफी जर्जर स्थिति में है। 24 खंबों के काले पत्थर कई जगह से जीर्ण-शीर्ण हो चुके है और उपेक्षा के अभाव में लगातार ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के इस मंदिर का क्षरण हो रहा है। सर्वप्रथम यही से महाअष्टमी से सरकारी पूजा की शुरूआत होती है। और यह पूजा जिला प्रशासन के मुखिया राज्य सरकार की ओर से प्रदेश और नगर की सुख-समृद्धि और प्राकृतिक आपदाओं से बचाने केलिए खुशहाली को लेकर की जाती है। मंदिर पुजारी ने बताया कि महामाया और महालाया दिन में तीन रुप बदलती है। कभी सौम्य रूप में तो कभ रोद्ररूप में आकर अपने भक्तों को आशीर्वाद देती है।

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