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महाकवि कालिदास की आराध्य है मां गढ़कालिका

माटी की महिमा न्यूज /उज्जैन। युगों-युगों से माता धरती पर अवतरित होकर दुष्टों का संहार और अपने भक्तों का उद्धार करती रही है। मां को भक्ति के अनेक रूपों से प्रसन्न किया जाता है। मां के रूप अलग-अलग होते हैं, लेकिन उनके वरदान हमेशा भक्तों के कल्याण के लिए होते हैं। माता धरती पर कई जगहों पर विराजमान है। हर जगह माता के स्थापित होने का एक पौराणिक आख्यान है। मां ने धरती पर अवतरण अपने भक्तों को छत्रछाया प्रदान करने के लिए लिया है। नवरात्र मां की आराधना का पर्व है और धरती पर मानवमात्र को सादगीभरी बेहतर जीवनशैली के लिए भी प्रेरित करता है।
जब देवताओं पर घोर विपत्ति आई और उनको बड़े कष्टों का सामना करना पड़ा तो उन्होने देवी को प्रसन्न करने के लिए कई जतन किए और देवी ने प्रसन्न होकर देवताओं को दानवों पर विजय होने का आशीर्वाद दिया। इसलिए देवी की आराधना से भक्त को जो महत्वाकांक्षा होती है माता उसको पूरा करती है। देवी को ज्ञान की, बुद्धि की और सर्वकल्याण की देवी कहा जाता है। प्राचीनकाल में सिद्धपुरूषों ने माता की आराधना कर सिद्धि पाई थी और कालजयी ज्ञान के अनन्त भंडार की रचना की थी। ऐसी ही सर्वकल्याण की देवी उज्जैन में विराजमान है, जिनको गढ़कालिका के नाम से जाना जाता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार गढ़कालिका माता का इतिहास बहुत प्राचीन है। मंदिर की स्थापना महाभारतकाल की मानी जाती है, लेकिन मान्यता है कि माता की चमत्कारी प्रतिमा सतयुग के काल की है। इस मंदिर में शुंगकाल, इस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी, चौथी शताब्दी गुप्तकाल और परमारकालीन दसवी शताब्दी की नीव और प्रतिमाएं प्राप्त हुई है। मंदिर का जीर्णोद्धार 606 ईस्वी में हर्षवर्धन द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है।
परमार शासन काल में भी इसके जीर्णोद्धार के प्रमाण मिलते हैं रियासतकाल में सिंधिया राजवंश ने भी मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था। गढ़ नामक स्थान पर होने के कारण देवी को गढ़कालिका कहा जाता है। मंदिर परिसर मे अतिप्राचीन दीपस्तंभ है। इस दीपस्तंभ में 108 दीप विद्यमान है, जिनको नवरात्रि के दौरान रोशन किया जाता है। शक्ति-संगम-तंत्र में अवन्ति संज्ञके देश कालिका तंत्र विष्ठति का उल्लेख है। अर्थात अवन्तिका नामक देश में माता कालिका स्वरूप में विराजमान है। स्कन्दपुराण में चौबीस मातृकाओं में देवी गढ़कालिका का उल्लेख है। त्रिपुरा रहस्य में देशभर में बारह प्रधान देवीविगृहों का विरूपण किया गया है, जिसमें गढ़कालिका की स्थिति मालवा में दर्शाई गई है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि उज्जैन में शिप्रा नदी के तट के पास स्थित भैरव पर्वत पर मां भगवती सती के ओष्ठ गिरे थे। माता गढ़कालिका की कथा का वर्णन लिंगपुराण में मिलता है, जिसके अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामचंद्र जब लंकाविजय कर अयोध्या प्रस्थान कर रहे थे उस वक्त कुछ समय के लिए उन्होने उज्जैन में रुद्रसागर के तट पर विश्राम किया था। रात्रि के समय मां कालिका अपनी भूख शांत करने के लिए शिकार की खोज में रुद्रसागर के किनारे आ गई। यहां पर उनका सामना महाबली हनुमान से हो गया। माता ने हनुमान को पकडऩे का प्रयास किया तो हनुमान ने विराट और भयानक रूप धारण कर लिया। हनुमान के इस रूप को देखकर माता भयभीत हो गई और भागने लगी। उस वक्त माता का एक अंश गलित होकर गिर गया। माता का जो अंश गिर गया, वही अंश गढ़कालिका के नाम से विख्यात हुआ। मां गढ़कालिका महाकवि कालिदास की आराध्यदेवी मानी जाती है। माता के आर्शीवाद से ही कालिदास ने कालजयी ग्रंतों की रचना की थी। कालिदास रचित श्यामला दंडक महाकाली स्तोत्र एक सुंदर रचना है। ऐसा कहा जाता है कि महाकवि के मुख से सबसे पहले यही स्तोत्र प्रकट हुआ था। उज्जैन में आयोजित होने वाले कालिदास समारोह में प्रतिवर्ष माँ कालिका की आराधना की जाती है।

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