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पहाड़ी पर विराजित हैं मां तुलजा भवानी और चामुंडा माता

नवरात्र में कोई जा रहा नंगे पैर तो कोई घुटनों के बल
माटी की महिमा न्यूज/उज्जैन/देवास।
देवास नगर में स्वमंभू विराजी माता तुलजा देवी और चामुंडा देवी, जो दो बहिनों के रूप में विख्यात है। बडी बहिन माता तुलजा देवी और छोटी बहिन माता चंामुडा देवी। टेकरी पर दक्षिण दिशा की ओर मां तुलजा भवानी यानी बड़ी माता का मंदिर स्थित है। इतिहासकारों के मुताबिक यह मंदिर भी चामुंडा माता मंदिर के समकालीन है। मंदिर में तुलजा माता की आधी प्रतिमा (ऊपरी हिस्सा) है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां तुलजा और मां चामुंडा दोनों बहनें हैं। प्राचीन समय में यह मंदिर छोटा था, लेकिन अब यहां प्रशासन द्वारा काफी निर्माण कार्य करवाकर इसे दर्शनार्थियों के लिए सुविधाजनक बनाया गया है। मां टेकरी पर उत्तर दिशा की ओर मां चामुंडा का मंदिर है। यह देवास रियासत के राजाओं की कुलदेवी के रूप में पूजी जाती हैं। इतिहास में उल्लेखित जानकारी के अनुसार मां चामुंडा की प्रतिमा चट्टान में उकेरकर बनाई गई है। पुराविदों ने इस प्रतिमा को परमारकालीन बताया है।
ऐसी मान्यता है कि मां के दरबार में सच्चे मन से कोई भी मुराद मांगी जाए वह पूरी होती है। देवास स्थित टेकरी पर विराजमान माता तुलजा देवी और चामुंडा देवी, अपने वैभव और मराठी शासक होलकर तथा पंवार राजवंश की कुलदेवी के रूप में विख्यात है। देवास टेकरी पर स्थित माँ तुलजा भवानी और उनकी छोटी बहिन माँ चामंडा भवानी स्वमंभू विराजमान है। विद्वानों की मानें तो देवी के 52 शक्तिपीठों में से एक मां चामुंड़ा देवी और मां तुलजा देवी के इस स्थान को शक्तिपीठ के रूप में मान्यता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार ऐसा बताया जाता है कि देश के अन्य शक्तिपीठों पर माता के शरीर के हिस्से गिरे थे। लेकिन यहां टेकरी पर माता का रुधिर यानि रक्त गिरा था। इस कारण माँ चामुंडा का प्राकट्य यहां हुआ। माँ चामुंडा को सात माताओं में माना जाता है। तुलजा भवानी की स्थापना मराठी राज परिवारों ने करवाई थी। मराठी राजाओं की यह कुलदेवी मानी जाती हैं। यह दोनों माताएं सगी बहनों के रूप में पूजी जाती हैं। इसके साथ ही देवास के संबंध में एक और लोक मान्यता यह है कि यह पहला ऐसा शहर है, जहां दो वंश राज करते थे, पहला होलकर राजवंश और दूसरा पंवार राजवंश। बड़ी माँ तुलजा भवानी देवी होलकर वंश की कुलदेवी हैं और छोटी माँ चामुण्डा देवी पंवार वंश की कुलदेवी। टेकरी में दर्शन करने वाले श्रद्धालु बड़ी और छोटी माँ के साथ-साथ भेरूबाबा के दर्शन अनिवार्य मानते हैं। नवरात्र के दिन यहां दिन-रात लोगों का तांता लगा रहता है। इन दिनों यहां माता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
देवास नगर का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष प्राचीन है। कहा जाता है कि देवास का नाम ही दो देवियों का वास से प्रचलन में आया है। ऊंचे भवन पर विराजित करोड़ों लोगों की आस्था का यह सदन बरसों पहले ऋषि-मुनियों की तपोस्थली भी रहा है। अभी तक मिले प्रमाणों के अनुसार पहाड़ी पर स्थित मां चामुंडा देवी की मूर्ति लगभग दसवीं शताब्दी की बताई जाती है। टेकरी पर एक सुरंग भी है जिससे करीब दो हजार साल पूर्व के इतिहास की जानकारी मिलती है। बताया जाता है कि यह उज्जैन और देवास के बीच गुप्त रूप से आने-जाने के लिए तैयार की गई थी। इस 45 किमी लंबी सुरंग का दूसरा छोर उज्जैन की भर्तहरि गुफा के पास निकलता है। किंवदंती कथा तो यह भी है कि उस समय उज्जैन के राजा भर्तहरि माँ चामुंडा की आराधना के लिए यहां आते थे और यहां तपस्या कर चुके हैं। भर्तहरि, महाराजा विक्रमादित्य के भाई माने जाते है। हालंकि देवास स्थित टेकरी पर स्थित मां तुलजा और मां चामुंडा मंदिर की प्राचीनता का कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन मान्यता है कि मंदिर अनादिकाल से है।
लोक मान्यता है कि देवी मां के दोनों स्वरूप जागृत अवस्था में हैं। बड़ी मां तुलजा भवानी और छोटी मां चामुण्डा देवी बहनें हैं। एक किंवदंती के अनुसार ऐसा माना जाता है कि एक बार दोनों माताओं में किसी बात को लेकर विवाद हो गया। गुस्साई दोनों माता टेकरी छोड़कर जाने लगीं। बड़ी मां पाताल में और छोटी मां टेकरी ने नीचे उतरने लगीं। माताओं को जाता देख उन्हें मनाने के लिए बजरंगबली और भेरूबाबा उनके पीछे चल दिए। जब हनुमानजी उनके पास पहुंचे तो उनका रौद्र रूप देख एक पल के लिए वे भी सहम गए। विनती के बाद दोनों माताएं मान गईं, लेकिन जब तक बड़ी मां का गुस्सा शांत होता उनका आधा धड़ पाताल में समा चुका था। वहीं छोटी माता टेकरी से काफी नीचे उतर आईं थीं, इस कारण बड़ी मां और छोटी मां उसी रूप में टेकरी पर विराजमान हैं।

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