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जेके हॉस्पिटल में शिशु की मौत के बाद शव देने से इंकार, परिजनों ने मचाया हंगामा

चरक अस्पताल के डॉ.एमडी शर्मा कर रहे थे निजी अस्पताल में ईलाज

उज्जैन। सिंधी कॉलोनी स्थित जेके हॉस्िपटल एक बार फिर विवादों में आ गया है। शुक्रवार को जेके हॉस्पिटल मेंे शिशु की मौत के बाद स्टाफ ने शव देने से इंकार कर दिया। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में शिशु को मौत होने के बावजूद बिल बढ़ाने के लिए वेंटिलेटर पर रखा हुआ था। महज डेढ़ दिन में ही अस्पताल में बेहिसाब बिल बना दिया। जिस पर परिजनों ने हंगामा मचाना शुरू कर दिया। हंगामें के बाद पुलिस ने परिजनों को शव दिलवाया। इधर हंगामे के दौरान अस्पताल संचालक ने मीडियाकर्मियों से भी अभद्रता की। विवाद थाने तक पहुंच गया। जहां काफी देर बाद दोनों पक्षों में समझौता हुआ।

नरवर निवासी सुभाष राजौरिया के पत्नी रचना ने 19 अक्टूबर को संजीवनी अस्पताल में बेटी को जन्म दिया था। जहां नवजात शिशु की तबियत बिगड़ने पर परिजन उसे चरक अस्पताल लेकर पहुंचे। अस्पताल में दो दिन तक भर्ती रहने के बाद चरक अस्पताल के ही डॉ.एमडी शर्मा ने शिशु को जेके हॉस्पिटल में भर्ती होने की सलाह दी। इसके बाद डॉ.एमडी शर्मा ने शिशु का दो दिन तक ईलाज किया। सुभाष राजौरिया के अनुसार बेटी को इंफेक्शन के चलते जेके हॉस्िपटल लेकर गए थे। जहां उसे इंफेक्शन बढ़ने पर वेंटिलेटर पर शिफ्ट कर दिया गया था। एसएनसीयू में उपचार के दौरान बेटी कोई मूवमेंट नहीं कर रही थी। मौत के बावजूद उसे वेंटिलेटर रखा गया था। केवल अस्पताल का बिल बढ़ाने के लिए ऐसा किया जा रहा था। जब उन्होनंे स्टाफ से वेंटिलेटर हटाने के लिए कहा तो वेंटिलेटर हटाते ही शिशु की मौत हो गई। 21 अक्टूबर की रात को उन्होनें नवजात को जेके हॉस्िपटल में भर्ती किया था। भर्ती करनेे के पहले ही अस्पताल में 8000 रूपए जमा करा लिए गए थे। जबकि मौत होने के बाद भी अस्पताल मैनेजमेंट द्वारा 28000 रूपए का बिल जमा करने की बात कही जा रही थी। जिसे जमा करने में वे असमर्थ थे। इसलिए उन्होनें मना कर दिया। जिस पर अस्पताल मैनेजमेंट ने शव देने से इंकार कर दिया। जिसकी सूचना उन्होनें अन्य रिश्तेदारों को दी। अस्पताल में हंगामे के बाद पहुंची माधव नगर थाना पुलिस ने शव को परिजनों को सौंपा। यहां ये बात गौर करने वाली है कि जेके हॉस्पिटल में चरक अस्पताल के विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ.एमडी शर्मा की देखरेख में नवजात बच्ची का उपचार चल रहा था। उसे इंफेक्शन के चलते उपचार दिया जा रहा था। लेकिन चरक अस्पताल के बजाए शर्मा ने बच्ची को जेके अस्पताल में भर्ती रखकर उपचार किया। जिससे साफ है कि शासकीय अस्पताल के डॉक्टर्स निजी अस्पताल में मरीजों को रैफर करते है और फिर वहां पर महंगा ईलाज करके मोटी रकम वसूलते है। फ्रीगंज के भी सभी अस्पताल में शासकीय चिकित्सक उपचार से लेकर ऑपरेशन तक की मोटी फीस वसूलते है। लेकिन अस्पताल द्वारा दिए जाने वाले बिल पर कभी भी इन डॉक्टर्स का नाम नहीं होता। शासकीय चिकित्सकों के निजी अस्पताल में प्रेक्टिस पर प्रतिबंध है। जिसके चलते बिल पर शासकीय चिकित्सकों का जिक्र नहीं किया जाता है।

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