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स्वप्न में आकर माता ने कहा शिप्रा किनारे मिलूंगी

माटी की महिमा न्यूज /उज्जैन। बेमिसाल पच्चीकारी से अलंकृत अद्भुत त्रिपदा मां गायत्री और ब्रह्माजी का सर्वांग्ड् मंदिर उर्दूपुरा स्थित खिड़क के पास है। मां गायत्री के अनन्य उपासक और अखण्ड दीपक तपोभूमि की स्थापना करने वाले ग्राम चिकली के आचार्यपं. स्व. रामचंद्र शास्त्री एक छोटे से टूटे फूटे मकान में गहन तप आराधना करके मां गायत्री के मंदिर को स्थापित करने की ठानी थी। इसके लिए शास्त्रीजी ने जयपुर से गायत्री माता की मूर्ति लाने का संकल्प किया तो उसी दिन रात्रि के तीसरे पहर में मां गायत्री ने उन्हें स्वप्न में आकर कहा कि ऐ पंडित मैं तूझे प्रात: 4 बजे ब्रह्म मुहूर्तमें ओखलेश्वर श्मशान के निकट बहने वाली शिप्रा नदी किनारे प्राप्त होऊंगी। जब पंडितजी उठे तो उन्हें लगा कि यह मात्र एक स्वप्न है। लेकिन जैसे ही प्रात:काल 4 बजे तब पंडित रामचंद्र शास्त्री ओखलेश्वर श्मशान की ओर अदृश्य शक्ति के साथी खींचे चले गए। जब पंडित शास्त्री ओखलेश्वर श्मशान के निकट कल कल बहती मां शिप्रा नदी पर पहुंचे तो वहां उन्हें एक काष्ठ की प्रतिमा मिली। जो कि महाकाली की प्रतीत होती थी। इस प्रतिमा को पं. रामचंद्र शास्त्री अपने साथ अपने उर्दूपुरा साधना स्थल पर ले आए। लेकिन असमंजस में थे कि महाकाली की काष्ठ प्रतिमा मिली है लेकिन उन्हें मां गायत्री की प्रतिमा स्थापित करना है। विचारों में खोए पं. शास्त्री के साधना स्थल पर दूसरे दिन एक तेजस्वी महात्मा आए। उनके मस्तक पर शास्त्रीजी ने त्रिपदा मां गायत्री की प्रतिमा देखी जिसे रखकर वे अंतध्र्यान हो गए। तब पं. रामचंद्र शास्त्री ने धूमधाम से मां गायत्री की प्रतिमा मंदिर में स्थापित की और नदी से प्राप्त मां काली की प्रतिमा उसके आगे स्थापित की। ध्यान और साधना में लीन रहने वाले पं. शास्त्री उज्जैन में और पिपलौदा बागला के पास विशाल यज्ञ भी संपन्न करा चुके हैं। पिपलौदा बागला में तो यज्ञ की पूर्णाहुति के समय गर्मीके दौरान नदी का जल दो तीन फीट तक उठ आया था। और उसमें से दूध की धारा फूट गई थी। पं. रामचंद्र शास्त्री का देवलोक गमन होने के बाद अति प्राचीन गायत्री मंदिर में पूजा पाठ एवं संचालन का कार्य पं. बुद्धिप्रकाश शास्त्री और उनके अनुज पं. कुलदीपक जोशी करते आ रहे हैं। मंदिर की ओर से राम जनार्दन मंदिर के सामने नारायण नारायण गौशाला की स्थापना भी की गईहै। यहां पर वृद्ध और असहाय गायों को रखा जाता हैऔर उनकी सेवा की जाती है। मंदिर में बटुकों को वैदिक ज्ञान की शिक्षा भी दी जाती है। गर्भगृह में मां गायत्री की प्रतिमा है। इसी स्थान पर मंदिर के संस्थापक स्व. पं. रामचंद्र शास्त्री की प्रतिमा भी स्थापित है। दूसरी मंजिल पर शिखर युक्त मंदिर में भगवान ब्रह्मा को मां सावित्री की प्रतिमा के साथ स्थापित किया है। मंदिर में गणेशजी, कार्तिकेय और शिव-पार्वती की प्रतिमा भी है। इसी जगह भगवान शेषशायी विष्णु और महालक्ष्मी की प्रतिमा भी है। मंदिर में कईवर्षों से अखंड ज्योति भी जल रही है।

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