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भैरवगढ़ जेल में बंदियों के साथ हो रहे अमानवीय अत्याचार एवं अन्याय

माटी की महिमा न्यूज /उज्जैन
वर्तमान सेन्ट्रल जेल उज्जैन का भैरवगढ़ में प्रियदर्शी सम्राट अशोक ने अवंति प्रांत का राज्यपाल रहते हुए निर्माण करवाया था और उसका नाम रखा था नरक। स्वतंत्र भारत में जब शासन की कल्याणकारी योजनाओं के अंतर्गत बंदियों का कल्याण होना था, वहीं सर्वग्रासी भ्रष्टाचार से इस ऐतिहासिक कारागार में बंदियों के साथ अमानवीय अत्याचार एवं अन्याय हो रहे हैं, जिससे भारतीय न्याय के आदर्श सम्राट विक्रमादित्य की कर्मभूमि में असहाय, निर्बल, निर्धन बंदियों का शोषण और उत्पीडऩ हो रहा है, जो भारतीय लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है।
उपरोक्त उल्लेख भैरवगढ़ जेल में निरूद्ध रहे 5 बंदियों अनिलसिंह बैस, मोहन यादव, राजेन्द्र कोटिया, राजेश कोरी तथा जयप्रकाश सक्सेना की ओर से मुख्य सचिव म.प्र. शासन, प्रमुख सचिव, गृह (जेल) विभाग, महानिरीक्षक जेल, आयुक्त एवं कलेक्टर उज्जैन तथा भैरवगढ़ सेन्टंल जेल अधीक्षक को प्रेषित न्याय प्राप्ति के सूचना-पत्र में अधिवक्ता सत्यनारायण पुरोहित ने करते हुए आरोप लगाया कि उक्त बंदियों ने 15 से 20 वर्ष न्यायिक दण्डादेश के अनुसार भैरवगढ़ जेल में बिताकर बंदियों से नियमित रूप से लिए जाने वाले कार्य किए हैं, लेकिन उन्हें विधिवत पारिश्रमिक न देकर उनका शोषण और उत्पीडऩ कर रिहाई के बाद भविष्य अंधकारमय बना दिया गया।
सूचना पत्र में यह भी उल्लेख है कि मेरे पक्षकारगण ने अपने जेल जीवन की अवधि में, जेल परिसर में अत्यधिक अनियमितताएं एवं भ्रष्टाचार देखा है, जिनमें प्रमुख हैं – बंदियों के भोजन तथा नियमित उपयोग की वस्तुओं के प्रदाय में भीषण भ्रष्टाचार तथा चोरी और कमीशनखोरी। घटिया स्तर के खाद्य एवं जीवनोपयोगी पदार्थों का बंदियों में वितरण। जेल की गौशाला से प्राप्त दूध की क्रीम निकालकर, घी बनाकर बंदियों में ही रु. 2,000 प्रति किलो गाय के घी की बिक्री तथा क्रीम निकले दूध की चाय बंदियों को पिलाना। केंद्रीय जेल भेरूगढ़ की पचासों बीघा कृषि भूमि भैरवगढ़ क्षेत्र में ही शिप्रा नदी के किनारे स्थित है, फिर भी सब्जियों आदि की आपूर्ति और खरीदी में भी भीषण भ्रष्टाचार। बंदियों को जेल मेन्युअल के अनुसार भोजन उपलब्ध न कराने पर और उनके बीमार होने पर औषधियों के वितरण में भी घटिया दवाईयां वर्षों से जमे कमीशनखोरों से लेकर बंदियों में वितरित कर उनके स्वास्थ्य से खिलवाड़ आदि कई अनियमितताओं और सर्वग्रासी भ्रष्टाचार के साथ ही कारागार को बंदी सुधार गृह के रूप में प्रचारित कर बंदियों के कल्याण और भविष्य निर्माण के लिए शिक्षण और प्रशिक्षण की समस्त शासकीय योजनाओं का लाभ इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय और औद्योगिक प्रशिक्षण संबंधी परीक्षाओं तथा प्रशिक्षण में भी भारी भ्रष्टाचार जेल में संचालित औद्योगिक/व्यावसायिक इकाईयों की तरह जारी है। मेरे पक्षकारगण ने अपने जेल जीवन में असहाय भुक्तभोगी और प्रत्यक्षदर्शी के रूप में उपरोक्त अन्याय को देखा है। लेकिन न्याय प्राप्ति की उनकी गुहार को निरंतर जेल प्रशासन ने अनसुना किया। जेल प्रशासन पर यह भी आरोप लगाया कि रिहाई के पश्चात् मेरे पक्षकार राजेन्द्र कोटिया ने सूचना के अधिकार के अंतर्गत अपने पारिश्रमिक की राशि की जानकारी मांगी तो उसे मानसिक रोगी प्रमाणित करने का असफल प्रयास किया। सूचना पत्र में भैरवगढ़ सहित मध्यप्रदेश की जेलों में व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार के संबंध में उल्लेख है कि जब सम्राट अशोक द्वारा स्थापित विक्रम की नगरी की जेल की उपरोक्तानुसार दुर्गति हो रही है तथा उसमें निरूद्ध बंदियों का जिनमें से अधिकांश कम आय वर्ग के मेहनतकश परिवारों से संबंधित हैं, उनका जीवन दूभर बनाने तथा पारिश्रमिक की राशि में भी हेराफेरी कर भविष्य अंधकारमय बना देने के आपके कृत्यों से यह प्रमाणित है कि पूरे मध्यप्रदेश में जेल परिसर में निरूद्ध बंदियों के साथ शासन की बंदी कल्याण की योजनाओं को पलीता लगाते हुए कितना भीषण भ्रष्टाचार और अन्याय हो रहा है? सूचना-पत्र में मांग की गई है कि लगभग 1,500 सजायाफ्ता बंदियों की क्षमता वाली भैरवगढ़ जेल में विगत् 10 वर्षों में हुए भीषण भ्रष्टाचार एवं अनियमितताओं की जांच न्यायहित में अनिवार्य है। इसलिए उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश से जांच करवाकर पीडि़त बंदियों को न्याय दिलवाया जावे अन्यथा एक माह की अवधि के पश्चात् न्याय प्राप्ति हेतु उच्च न्यायालय के समक्ष याचिका प्रस्तुत की जावेगी।

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