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तपागच्छ के तपसम्राट बने श्री हंसरत्नसूरीश्वरजी म.सा.-श्री वीररत्नविजयजी महोत्सव के रूप में होगा 180 उपवास का इतिहास रचने वाले जैनाचार्य का पारणा

सुनीलनाहऱ:

शाजापुर। भारत वर्ष में इस समय एक अनूठा इतिहास रचा जा रहा है ।19 वर्षों के साधना काल में 3500 उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले महामुनि जैनाचार्य हंसरत्न सुरीश्वरजी म.सा. द्वारा चार बार 180 उपवास करके एक कीर्तिमान स्थापित किया रहा है। हंसरत्नसूरीश्वरजी म.सा.के महान तप का समापन 19 दिसंबर को होगा। 
उक्त बातें प.पू. अनुयोगाचार्य श्री वीररत्न विजयजी म.सा.ने श्री त्रिभुवनभानु पार्श्वनाथ- श्री मणिभद्रवीर जैन तीर्थ शिवपुर में जानकारी देते हुए कही। अनुयोगाचार्य ने कहा कि भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के 2600 वर्षों में श्री हंसरत्न सुरीश्वरजी प्रथम तपस्वी है जिन्होंने चार-चार बार 180 उपवास करके प्रभु शासन के गौरव में चार चांद लगाए हैं। जैन जगत आज भी जयवंत तथा जीवंत है इसका प्रमुख कारण दान – शील तथा तप है, दुर्गति नाशक दान है, सद्गति दायक शील है ओर कर्मनाशक तप है। प्रभु का तप- धर्म पूर्ण रूप से निर्दोष तथा सुविशुद्ध है। उपवास में दिन में भी नहीं, रात को भी नहीं, भोजन का पूर्ण त्याग, अन्न के साथ दूध- फल -मेवा आदि संपूर्ण खाद्य पदार्थों का त्याग होता है। सुबस 10 बजे से सूर्यास्त तक सिर्फ उबले हुए जल को ही स्वीकार किया जाता है। इतिहास पढ़ा जाता है, इतिहास सुना जाता है किंतु जैनाचार्य श्री हंसरत्नसूरीश्वरजी ने तो तप का एक गौरवशाली इतिहास रच दिया है जो सुदीर्घ समय तक अमिट ओर असीम रहेगा। जैनाचार्य की तपस्या को सुनकर तन-मन-जीवन सब कुछ नतमस्तक बन जाता है। अनुयोगाचार्य श्री ने कहा कि मुझे गर्व – गौरव है, आनंद तथा प्रसन्नता है। जैनों के 10 हजार साधु -साध्वी में ऐसा करने वाले महान संत मेरे गुरु भाई हैं तथा परम गुरुदेव श्री भुवनभानुसूरीजी महाराज के प्रिय शिष्य हैं। मुझे प्राप्त जानकारी के अनुसार तप- साधना के समय में यह महात्मा प्रतिदिन 13 घंटे जाप-ध्यान-स्वाध्याय में ही व्यस्त रहते हैं। व्हील चेयर का उपयोग नहीं करते हुए देव दर्शन तथा गुरू वंदन पैदल ही जाते हैं। एसे महान तपसम्राट के पारणे का महोत्सव भी एतिहासिक होगा। मुंबई में 20 दिसंबर को विराट आयोजन के साथ गच्छाधिपति पूज्य आचार्य श्रीविजय राजेंद्रसूरीश्वरजी म. सा. तथा पद्मभूषण पूज्य आचार्य श्रीविजय रत्नसुंदरसुरीश्वरजी महाराज साहब की शुभ निश्रा व 500 साधु- साध्वी के सानिध्य में पारणा होगा। इस उपलक्ष्य को समग्र भारत सहित विदेशों में निवासित जैन समाज भी तप दिवस के रूप में मनाएगा। सभी स्थानों पर उस दिन उपवास- आयंबिल का तप-नवकार मंत्र का विशेष जाप-साधार्मिक भक्ति व जीव दया पालन जैसे कई धार्मिक कार्यक्रम होंगे। जिन मंदिर में महापूजन तथा परमात्मा की कलात्मक अंगरचना भी होगी।
महातपस्वी के दर्शन मिलना भी ईश्वर का दुर्लभ आशीर्वाद
दो बार वर्षी तप की आराधना- जिसमें 360 दिन में 182 उपवास, गुणसंवत्सर महातप- जिसमें 494 दिन में 423 दिन उपवास, 16 उपवास-दो बार, 30 उपवास 4 बार, 31 उपवास 2 बार, 32 उपवास दो बार, 33 उपवास तीन बार तथा 34 -35-36-37-38-39-40-42-43- 44-45-46-51-52-62-64-68 -77-90-91-95-108-122-123 उपवास एक बार करने वाले तपसम्राट 180 उपवास का इतिहास  चार बार रच चुके हैं। इनके दर्शन मिलना ईश्वर के आशीर्वाद से मिला दुर्लभ सौभाग्य है। महातप के दिव्य प्रभाव से जैनाचार्य श्री को दिव्य शक्ति का सानिध्य प्राप्त हो रहा है।

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