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कोर्ट के स्टे के बाद भी विवादित मकान को दी थी निर्माण की अनुमति… उज्जैन लोकायुक्त ने नगर निगम के चार अधिकारीयों पर एफआईआर दर्ज की

 शैलेन्द्रसिंह चौहान, पुलिस अधीक्षक लोकायुक्त उज्जैन ने बताया कि शिकायतकर्ता दिव्यासिंह निवासी ऋषिनगर ने लोकायुक्त महोदय को दिनांक 11.06.2020 को एक लिखित शिकायत की थी, जिस पर से जांच प्रकरण क्रमांक 39/2020 दर्ज कर विधि सलाहकार द्वारा जांच की गई, उनकी जांच अनुसार निरीक्षक बसंत श्रीवास्तव ने नगर पालिक निगम उज्जैन के तत्कालीन नगर निवेशक मनोज पाठक, तत्कालीन भवन अधिकारी रामबाबू शर्मा, तत्कालीन भवन अधिकारी अरूण जैन, भवन निरीक्षक मिनाक्षी शर्मा एवं सुशील जैन डायरेक्टर आर.एम.विनो इस्टेट डेव्हलपर्स प्रायवेट लिमिटेड कंपनी इंदौर के विरूद्ध धारा 7, 13(1) (ए) (बी) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 एवं 120-बी भादवि का अपराध पंजीबद्ध किया जाकर विवेचना निरीक्षक बसंत श्रीवास्तव द्वारा की जा रही है। प्रकरण का संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है- शिकायतकर्ता दिव्या सिंह द्वारा प्रस्तुत शिकायत आवेदन पत्र के अनुसार मुख्य रूप से यह आक्षेप लगाये है कि शिकायतकर्ता अचल संपत्ति क्रमांक-40 विश्वविद्यालय मार्ग फीगंज उज्जैन की सहस्वामीनी है तथा उक्त संपत्ति अविभाजित व मास्टर प्लान अनुसार आवासीय है। उक्त प्रश्नाधीन संपत्ति के अन्य सहस्वामीगण ने आर.एम.विना इस्टेट डेवलपर्स प्रा.लि. द्वारा डायरेक्टर सुशील जैन को संपूर्ण संपत्ति स्वयं की बताते हुये विक्रय कर दी एवं उक्त संपत्ति पर क्रेता आर.एम.विनो. इस्टेट डेवलपर्स प्रा.लि. ने व्यवसायिक उपयोग हेतु नगर निगम उज्जैन से वैधानिक उपबंधों के विपरीत भवन निर्माण अनुज्ञा प्राप्त की है। जबकि शिकायतकर्ता ने प्रश्नाधीन अविभाजित संपत्ति में से न तो अपने हिस्से को विक्रय किया न ही प्रश्नाधीन संपत्ति पर निर्माण की अनुमति हेतु अनापत्ति प्रस्तुत की है। शिकायतकर्ता एवं प्रश्नाधीन संपत्ति के सहस्वामीगण के मध्य स्वत्व का विवाद होकर इस संबंध मे न्यायालय में प्रकरण लंबित है, जिसमें न्यायालय द्वारा निर्माण पर स्थगन भी दिया गया है, जिसकी जानकारी आपत्ति आवेदन पत्र के माध्यम से दिये जाने के उपरांत भी भवन निर्माण की तथा प्रश्नाधीन भूखण्ड के आवासीय उपयोग से व्यवसायिक उपयोग में परिवर्तन होने के उपरांत भी वैधानिक उपबंधों के विपरीत दी गई। आयक्त. नगर पालिक निगम ने वैधानिक उपबंधों निर्माण अनज्ञा को निरस्त नहीं किया है उक्त आधार पर शिकायतकर्ता ने नगर निगम अ भवन अधिकारी अरूण जैन व अन्य उत्तरदायी के विरूद्ध जांच कर कार्यवाही की प्रार्थना की है।

प्रश्नाधीन भूखण्ड के विक्रय पत्र जो आर.एम.विनो इस्टेट डेवलपर्स प्रा.लि. के पक्ष मे निष्पादित है, का अवलोकन करने पर पाया गया कि, विक्रय पत्र में विक्रेता के रूप में शिकायतकर्ता सुश्री दिव्या सिंह का नाम नहीं है, जबकि उक्त विक्रय पत्र के पृ.क्र. 8-9 एवं 10 में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि प्रश्नाधीन संपत्ति के मूल स्वामी स्व. भैरोसिंह पिता हीरासिंह है, जिन्होंने विक्रय विलेख दिनांक 04.11.58 द्वारा प्रश्नाधीन संपत्ति क्रय की थी। भैरोसिंह का स्वर्गवास दिनांक 18.10.67 को हआ एवं उनकी पत्नि नवलकंवरबाई की भी मृत्यु हो चुकी है। उनकी मृत्यु उपरांत प्रश्नाधीन संपत्ति उनके प्राकतिक उत्तराधिकारी पत्रगण-हरमत सिंह, प्रयाग सिंह, गजराज सिंह, रणधीन सिंह तथा पुत्रियों केसकुंवर बाई, शैतानकुंवर, सजनकुंवर बाई में वेष्ठित हुई। प्रश्नाधीन संपत्ति के उक्त सात सहस्वामी में से केसर बाई, शैतानकुंवर एवं संजनकुंवर बाई ने क्रमशः पंजीकृत हक त्याग विलेख दिनांक 03.02.79, 24.03.79 एवं 24.03.79 को निष्पादित कर क्रमशः हरमत सिंह, प्रयाग सिंह के उत्तराधिकारीगण एवं ठाकुर स्व. रणधीन सिंह के उत्तराधिकारी के पक्ष में हकों का त्याग किया। अन्य सहस्वामी गजराज सिंह एवं उनके वारिसान ने अन्य पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा प्राप्त कर लिया होने से प्रश्नाधीन संपत्ति हुरमत सिंह, प्रयाग सिंह, रणधीर सिंह के स्वत्व स्वामित्व की हई एवं पश्चात में उनके वारिसानगण/उत्तराधिकारीगण को भी प्रश्नाधीन संपत्ति में स्वामी नाते हक प्राप्त हए। इस प्रकार शिकायतकर्ता दिव्या सिंह जो कि, स्व. प्रयागसिंह की पुत्री है, भी प्रश्नाधीन संपत्ति में सहस्वामीनी हैं। नगर निगम उज्जैन ऐसी नामांतरण नस्ती प्रस्तुत करने में असफल रहा है जिससे यह प्रकट होता है कि प्रयाग सिंह के मृत होने के उपरांत उनके वारिसान के नाम रिकार्ड पर लिये गये यदि नामांतरण की नस्ती गुम हो गई थी तब भी नांमातरण पंजी मे नस्ती के अंतिम परिणाम का उल्लेख होना चाहिए था, जो कि नहीं है। नगर निगम उज्जैन द्वारा प्रस्तुत संपत्तिकर, समयकित कर व अन्य कर निर्धारण रजिस्टर मे हुरमत सिंह का नाम कम कर सीधे प्रश्नाधीन भूखण्ड के क्रेता आर.एम.विनो इस्टेट डेवलपर्स प्रा.लि. डायरेक्टर सुशील जैनका नाम की प्रविष्टि कर दी जाने से भी यह प्रकट है कि प्रश्नाधीन भूखण्ड से संबंधित नामांतरण पंजी में प्रश्नाधीन भूखण्ड के सहस्वामी प्रयागसिंह के सभी वारिसों के नाम की प्रविष्टि नहीं की गई थी। उसके उपरांत भी निर्माण की अनुमति दी गई। जिससे प्रकट है कि नगर पालिका निगम उज्जैन के अधिकारीगण प्रश्नाधीन भूखण्ड के क्रेता को अवैध रूप से लाभ पहंचाना चाहते थे इसी कारण विधि के उपबंधो के विपरीत भवन निर्माण की अनुमति अवैध रूप से प्रदान की गई। विक्रय पत्र के आधार पर प्रश्नाधीन भूखण्ड के क्रेता का नामांतरण एवं प्रश्नाधीन भूखण्ड पर क्रेता को निर्माण की अनुमति तभी संभव थी जबकि नामांतरण पंजी में अंतिम रूप से दर्शित सहस्वामीगण ने संपत्ति बेची हो किन्तु स्व. प्रयागसिंह, हुरमत सिंह द्वारा प्रश्नाधीन संपत्ति बेची हो ऐसा उल्लेख नामांतरण पंजी में नहीं है। तब नामांतरण पंजी के विपरीत स्व. प्रयागसिंह के वारिसान के नाम की प्रविष्टि के बिना न तो क्रेता का नाम चढ़ सकता था न ही निर्माण की अनुमति दी जा सकती थी, और यदि नगर निगम के नामांतरण पंजी में प्रश्नाधीन भूखण्ड के सभी मूल स्वामी अथवा उनके वारिसान ने विक्रय पत्र निष्पादित नहीं किया तब ऐसे विक्रय पत्र से संपत्ति का पूर्ण विक्रय होना नहीं माना जा सकता है। विक्रेता भूमि स्वामी के अलावा शेष रहे अन्य स्वामी के बंटवारे के बिना यह भी नहीं कहा जा सकता कि क्रेता ने संयुक्त स्वामित्व के अविभाजित भूखण्ड का कौन से हिस्सा खरीदा तब ऐसे क्रेता को प्रश्नाधीन संपूर्ण भूखण्ड के बंटवारे के बिना निर्माण की अनुमति नहीं दी जा सकती। अतः नामांतरण पंजी में ऐसे प्रविष्टियाँ नहीं होने भी एवं प्रश्नाधीन भूखण्ड के सभी सहस्वामियों द्वारा प्रश्नाधीन भूखण्ड विक्रय नहीं किये जाने के उपरांत भी भवन निर्माण की अनुज्ञा दिया जाना ऐसा अवैध कृत्य है, जो प्रश्नाधीन भूखण्ड के क्रेता बिल्डर को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया है। प्रश्नाधीन भूखण्ड पर निर्माण की अनुज्ञा बी+जी+3 वर्गमीटर क्षेत्रफल पर वाणिज्यक उपयोगार्थ अनमति आर.एम.विनो इस्टेट डेवलपर्स प्रा.लि. के डायरेक्टर सुशील जैन व अन्य को दिनांक 14.05.2018 को प्रदान की गई थी जिससे प्रकट होता है कि, प्रश्नाधीन भूखण्ड जो कि आवासीय उपयोगार्थ था, के उपयोग में परिवर्तन होकर निर्माण की अनुमति वाणिज्यिक उपयोगार्थ दी गई थी। म.प्र. भूमि विकास नियम 2012 के नियम 2 (5) (क) के अंतर्गतभूमि के विकास के लिए अनुज्ञा प्रदान करने हेतु संचालक, नगर तथा ग्राम निवेश प्राधिकृत अधिकारी होने से नगर एवं ग्राम निवेश से ले-आउट स्वीकृत कराये बिना एवं अनापत्ति प्राप्त किये बिना नगर पालिक निगम को भवन निर्माण अनुमति देने की अधिकारिता ही नहीं थी। तब अधिकारिता से बाहर जाकर नगर पालिका निगम उज्जैन द्वारा प्रश्नाधीन भूखण्ड पर विधि विपरीत निर्माण की अनुमति देकर क्रेता बिल्डर को लाभ पहुंचाते हुए पद का दुरूपयोग किया जना स्पष्टतः प्रकट है। मूलतः प्रश्नाधीन भूखण्ड आवासीय था। अतएव नगर निगम से अनुमति मिलने के पूर्व नगर तथा ग्राम निवेश से ले-आउट तथा अनापत्ति प्राप्त करनी थी. जो कि क्रेता आर.एम.विनो इस्टेट डेवलपर्स प्रा.लि. के डायरेक्टर सुशील जैन एवं अन्य द्वारा प्राप्त नही की एवं नगर तथा ग्राम निवेश के पत्र/परिपत्र अनुसार जिस भूमि के उपयोग का परिवर्तन न हो उस भूमि पर निर्माण की अनुमति हेतु नगर तथा ग्राम निवेश की अनुमति आवश्यक नहीं थी, किन्तु प्रश्नाधीन भूखण्ड पर निर्माण की अनुमति के संबंध में कोई स्पष्ट अभिमत नगर निगम उज्जैन न तो प्राप्त किया न ही नगर तथा ग्राम निवेश द्वारा इस संबंध में कोई अभिमत नगर निगम उज्जैन को प्रेषित किया। उसके उपरांत भी नगर निगम उज्जैन द्वारा बिना, नगर तथा ग्राम निवेश के ले-आउट एवं अनापत्ति के नगर तथा ग्राम निवेश से प्राप्त ऐसे पत्रों/परिपत्रों का उपयोग गलत निर्वचन करते हुए प्रश्नाधीन भूखण्ड पर निर्माण की अनुमति अवैध रूप से दी। जबकि उक्त दस्तावेज अन्य भूखण्डों के निर्माण/भवन पूर्णतः प्रमाण पत्र/भवन की ऊंचाई ग्राउंड कवरेज की जानकारी से संबंधित थे। वस्तुतः क्रेता को चाहिए था कि वह नगर तथा ग्राम निवेश मे आवेदन प्रस्तुत कर इस आशय की टीप अपने आवेदन पर प्राप्त करता कि नगर तथा ग्राम निवेश से ले-आउट स्वीकृत हो गया है अथवा ऐसी अनापत्ति की टीप प्राप्त करता कि, नगर तथा ग्राम निवेश को निर्माण की अनुमति नगर निगम उज्जैन से ली जाने में क किन्तु इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया एवं निर्माण कार्य से प्रश्नाधीन भूखण्ड से उपयोग में सारवान परिवर्तन भी हो रहा था. उसके उपरांत भी निर्माण की प्रथम अनज्ञा दिनांक 14.05.2019 दी गई जो कि अवैधानिक है। इसी प्रकार निर्माण की द्वितीय अनुमति दिनांक 14.07.2020 मॉल बनाने के लिए दी गई, तत्समय भी शिकायतकर्ता का आवेदन नगर निगम के रिकार्ड पर था, जिसमें प्रश्नाधीन भूखण्ड के उपयोग में परिवर्तन एवं सहस्वामी द्वारा भूखण्ड विक्रय नहीं किये जाने की सूचना थी, उसके उपरांत भी अवैधानिक रूप से अनुज्ञा दी गई। यपि शिकायतकर्ता द्वारा श्री क्षितिज सिंघल, आयुक्त, नगर पालिक निगम उज्जैन पर भी यह आक्षेप लगाये है कि अवैध रूप से विधि विपरीत दी गई भवन अनुज्ञा को आयुक्त नगर पालिक निगम उज्जैन द्वारा निरस्त करने के स्थान पर इस अवैध कृत्य को संरक्षण दिया गया है। किन्तु जांच के दौरान यह तथ्य प्रकट होने से कि आयुक्त, नगर पालिक निगम उज्जैन के पत्र दिनांक 24.10.2020 द्वारा क्रेता बिल्डर के डायरेक्टर सुशील जैन को भवन निर्माण की दी गई अनुमति दिनांक 14.07.2020 क्यों न निरस्त किया जावें, इस बाबत कारण बताओं सूचना पत्र प्रेषित किया था। तत्पश्चात् उक्त क्रेता द्वारा सिविल न्यायालय से उक्त सूचना पत्र के क्रियान्वयन के संबंध मे स्थगन प्राप्त कर लिया गयां अतः इस प्रकम पर आयुक्त, नगर पालिक निगम, उज्जैन क्षितिज सिंघल की संलिप्तता अवैध भवन निर्माण की अनुज्ञा की कार्यवाही के संरक्षक के रूप में प्रथम दृष्ट्या प्रकट नहीं होती किन्तु अनुसंधान में आयुक्त नगर निगम, उज्जैन की संलिप्तता पाई जाने पर कार्यवाही की जा सकती है। जांच मे पाये गये उक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि नगर निगम उज्जैन द्वारा निर्माण की प्रथम अवैधानिक अनुमति दिनांक 14.05.2019 को देने वाले अधिकारी तत्कालीन नगर निवेशक मनोज पाठक, तत्कालीन भवन अधिकारी रामबाबू शर्मा, मीनाक्षी शर्मा भवन निरीक्षक तथा द्वितीय अवैधानिक अनुमति दिनांक 14.07.2020 को देने वाले अधिकारी तत्कालीन नगर निवेशक मनोज पाठक, तत्कालीन भवन अधिकारी अरूण जैन, मीनाक्षी शर्मा भवन निरीक्षक द्वारा अपनी पदीय स्थिति का दुरूपयोग करते हुए भ्रष्टाचार कर उक्त लोकसेवकों द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की एवं संशोधित अधिनियम 2018 की धारा 7 सहपठित धारा 13(1)(ए)(बी) का अपराध कारित किया जाना प्रथम दृष्ट्या सबूत पाये जाने एवं आर.एम.विनो इस्टेट डेवलपर्स प्रा.लि. कंपनी के डायरेक्टर सुशील जैन (प्रायवेट व्यक्ति) एवं अन्य सभी डायरेक्टरर्स के विरूद्ध भा.दं.स. की धारा 120-बी के अंतर्गत अपराध सबूत पाये जाने से आरोपीगण 1- मनोज पाठक, तत्कालीन नगर निवेशक 2- रामबाबू शर्मा, तत्कालीन भवन अधिकारी 3- अरूण जैन, तत्कालीन भवन अधिकारी 4| शर्मा, भवन निरीक्षक सभी नगर पालिक निगम उज्जैन एवं आर.एम.विनो इस्टेट डेवलपर्स प्रा.लि. कंपनी के ल जैन एवं अन्य सभी डायरेक्टरर्स के विरूद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधन-2018) की धारा 7, 13(1)(ए)(बी) एवं भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120-बी के तहत अपराध पंजीबद्ध किया जाना जाकर विवेचना निरीक्षक बसंत श्रीवास्तव द्वारा की जा रही है।

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