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लॉकडाउन में पालन हुआ मुश्किल, व्यापारी बोले- कोरोना संक्रमण के कारण आय बंद, खर्च चालू
उज्जैन/राहुल सिंह बैस। इस बार भी कोरोना संक्रमण के कारण अक्षय तृतीया का पर्व सूना-सूना बीत गया। हर साल घोड़े की इतनी डिमांड होती थी, कि सुबह से रात तक फुर्सत नहीं मिलती थी। रात तक घोड़ा आर्डर पर रहता था। दिन में दो आर्डर के बीच समय निकालकर उसे खिलाना पड़ता था। लेकिन बीते एक साल से आर्डर ही नहीं हैं। घर बैठे-बैठे उसका खर्च निकालना मुश्किल हो रहा है। वहीं प्राणी को घुमाने भी नहीं ले जा पा रहे हैं। इससे उनके स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा है।
यह व्यथा है शहर में शादी-ब्याह और आयोजनों में घोड़े भेजने वाले हर घोड़े मालिक की, जो लगातार दूसरे साल उन पर बीत रही है। शहर के शादी-ब्याह में घोड़ा लगाने वाले व्यापारी ने बताया कि हमारे पास एक दर्जन से अधिक घोड़े हैं। कोरोना के पहले तक ये कम पड़ते थे। लोग महीनों पहले आकर बुकिंग करवा लेते थे। लेकिन बीते साल से बुरा हाल है। पिछले एक साल में केवल नवंबर का महीना ही ऐसा गया जिसमें थोड़े बहुत आर्डर मिले थे। इस बार वैसे भी शादी ब्याह के मुहूर्त कम थे। शादी के अलावा जुलूस-रथयात्रा से कमाई होती है, लेकिन अब वो भी बंद हो गई है इसलिए अपने पास से इनका रखरखाव करना होता है। शहर के सभी घोड़ा मालिकों के पास इस तरह के आयोजनों में काम आने वाले 300 से अधिक घोड़े हैं जिनकी प्रजाति के हिसाब से कीमत एक लाख से 15 लाख रुपये तक है।
लॉकडाउन से घोड़े भी हुए प्रभावित
एक अन्य घोड़ा मालिक ने बताया कि लाकडाउन में हमारे घोड़े घर पर ही हैं। अकेला आदमी भी मास्क पहन घोड़े को घुमाने ले जाता है, तो पुलिस वापस लौटा देती है। घर में बंधे-बंधे घोड़े बीमार हो रहे हैं। उनके पैरों में सूजन जैसी तकलीफ हो रही है। आम दिनों में जब आर्डर नहीं होते तो घोड़े को घुमा लाते हैं। अब वे एक जगह पर बंधे हैं।
एक घोड़े का औसत खर्च 400 से 600 रू. तक
व्यापारी ने बताया कि सालों से साथ में रहने वाले घोड़े परिवार के सदस्य जैसे हो जाते हैं, जिनके भोजन का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। हरी घास, चने, चापड़, दूध, बाजरा आदि नियमित रूप से दिया जाता है। घोड़े की डाइट भी फिक्स हो जाती है। अगर उसमें कमी की जाती है तो घोड़ा दुबला हो जाता है। फिर भी हर दिन औसतन 400 से 600 रुपये तक का खर्च एक घोड़े के खाने पर खर्च हो जाता है। इसके अलावा नियमित रूप से डाक्टरों से उनका परीक्षण भी करवाना होता है। यह सब खर्च अभी भी जारी है, लेकिन आय बंद हो गई है।
शहर के बैंड संचालक भी जूझ रहे आर्थिक संकट से
कोरोना संक्रमण के कारण शहर में एक दर्जन से अधिक बैंड संचालक बैंड का संचालन करते हैं। इस साल भी बैंड संचालक आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। क्योंकि कोरोना के कारण प्रशासन ने शादियों पर प्रतिबंध लगा रखा है। बैंड संचालकों ने सीजन को देखते हुए नई गाडिय़ां तैयार करवा ली थी लेकिन शादियों का मुहूर्त आते ही कोरोना ने एक बार फिर दस्तक दे दी जिससे बैंड संचालक कर्ज में दब गए हैं और आर्थिक संकट से घिरे हैं।

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