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ज्योतिष सम्राट जैनाचार्य श्री विजय ऋषभचंद्र सुरीश्वरजी म.सा. का देवलोकगमन 
शाजापुर।
मानव सेवा के श्रेष्ठतम मसीहा थे, जैनाचार्य श्री विजय ऋषभचंद्र सुरीश्वरजी म.सा.। जन – जन के मन में, वचन में, जीवन में उनका स्थान मान-सम्मान सर्वोत्तम था। मोहनखेड़ा तीर्थ को प्रभु मंदिर, गुरु मंदिर के साथ ही उन्होंने मानव – सेवा मंदिर के रूप में विशेष पहचान दिलाने का काम किया। मोहनखेड़ा को विश्व की सर्वश्रेष्ठ धरोहर बनाने का पूर्ण श्रेय किसी को है, तो वह आचार्य श्री को है। 
उक्त बातें जैन तीर्थ शिवपुर- मातमोर में आचार्यश्री को भावपूर्ण श्रद्धा- सुमन अर्पित करते हुए अनुयोगाचार्य श्री वीररत्न विजय जी म.सा. ने कही। महाराजश्री ने कहा कि समग्र शरीर में उनको व्याधियों ने घेर रखा था, किंतु उनके चेहरे की प्रसन्नता- सरलता- सहजता कभी गायब नहीं हुई। उनमें व्याधि में भी समाधि का दिव्य -दर्शन होता था। आचार्य श्री के विशाल भक्त वर्ग में उद्योगपति, डॉक्टर, इंजीनियर, राजनीतिज्ञ तथा बुद्धिजीवी थे तो आदिवासी- दलित- गरीब- अनाथ-भील समाज के दिल -दिमाग में भी भगवान के रूप में आचार्य श्री की प्रतिष्ठा थी।उनकी एक आवाज पर हजारों आदिवासी मोहनखेड़ा की आन -बान- शान की सुरक्षा के लिए खड़े हो जाते थे। जिन -भक्ति के साथ जीव मैत्री भी उनकी अद्भुत थी। उनके मार्गदर्शन में तीर्थ की गौशाला की व्यवस्था काबिले तारीफ है। महाराजश्री ने बताया कि उनके साथ मेरी आत्मीयता पिछले 35 वर्षों से थी । मोहनखेड़ा – पालीताणा – इंदौर जहां भी उनसे मिलना हुआ तब जगत व जगतपति की चर्चा व चिंतन में हम आनंद से सराबोर हो जाते थे। जाप – ध्यान – मंत्र साधना तीर्थ – व्यवस्था के विषय में गंभीर विचार – विमर्श हो जाता था। विगत 15 दिन पहले ही मुझे समाचार आया कि वीररत्न म.सा. आप कैसे हो? आज आप की याद ज्यादा आ रही है। मेरे निमंत्रण पर आपने कई बार कहा – मुझे शिवपुर – मातमोर तीर्थ जरूर आना है। सुना है – ध्यान साधना के लिए यहां प्रकृति का सुंदर वातावरण है। मेरे लिए उनका जाना असहनीय क्षति है। प्रभु से प्रार्थना है कि आचार्य श्री की आत्मा को सद्गति तथा परमगति की प्राप्ति हो। ये भी दुर्लभ संयोग है कि 4 जून 1957 को सियाना (राजस्थान) में जन्में आचार्यश्री का कालधर्म 3 जून को हुआ। श्री  त्रिभुवन भानु पार्श्वनाथ-श्री माणिभद्रवीर जैन तीर्थ शिवपुर ट्रस्ट मंडल ने मौन तथा 12 नवकार- शांति पाठ के साथ आचार्यश्री को आदर सहित श्रद्धा- सुमन अर्पित किए।

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